पूसा संस्‍थान के प्रौद्योगिकी हस्‍तांतरण कार्यक्रमों को राष्ट्रीय स्‍तर पर स्‍थापित करने के लिए सन 1984 में एक पृथक प्रौद्योगिकी हस्‍तांतरण इकाई (UTT) की स्‍थापना की गई। इस इकाई ने देश के विभिन्न हिस्‍सों में कई उपयोगी कार्यात्‍मक अनुसंधान कार्यक्रमों को चलाया। किसानों और अन्‍य क्‍लायंटों को कृषि प्रौद्योगिकियाँ हस्‍तांतरित करने में कैटेट की भूमिका अग्रणी रही हैं। इस द्वारा विकसित विधियाँ और रणनीतियाँ निम्नलिखित हैं:

  • सामुदायिक खेती विधि
  • संस्‍थान ग्राम संपर्क कार्यक्रम के जरिए प्रौद्योगिकी आकलन एवं परिशोधन
  • बीज उत्‍पादन कार्यक्रमों के जरिए प्रजातीय विकास कार्यक्रम
  • टिकाऊ फसल उत्‍पादन के लिए जल प्रबंधन प्रौद्योगिकियों पर किसान सहभागिता कार्यात्‍मक अनुसंधान कार्यक्रम
  • किसान सहभागिता युक्त बीज उत्‍पादन
  • गेहूं और मक्‍के के अग्र पंक्ति प्रदर्शन (FLDs)
  • आकाशवाणी पाठशाला
  • संस्‍थान 17 राज्‍य कृषि विश्‍वविद्यालयों और भा.कृ.अ.परिषद के संस्‍थानों के सहयोग से चलने वाला राष्ट्रीय प्रसार कार्यक्रम
  • स्‍वयंसेवी संस्‍थाओं के साथ सहभागिता कार्यक्रम
  • गावों का एकीकृत विकास और मॉडल ग्राम संकल्‍पना

 

उल्‍लेखनीय उपलब्धियाँ:

  • सन 80 के पूर्वार्ध में पूर्वी उत्तर प्रदेश के कछारी क्षेत्रों में सरसों और चने की उपज में लगभग तीन गुना बढ़ोत्तरी कर इन फसलों में क्रांति लाई गईं। इससे राष्ट्रीय स्‍तर पर सुनहरी क्रांति में योगदान मिला और इस क्षेत्र में दलहन उत्‍पादन में बढ़ोत्तरी दर्ज की।
  • सन 1990 में उत्तरकाशी (अब उत्तराखंड में) भूकंप की तबाही के बाद केंद्र द्वारा किए गए तकनीकी अंतर्क्षेपणों से उस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर पूसा संस्‍थान की प्रौद्योगिकियों का फैलाव हुआ। जिससे इस क्षेत्र के किसानों की आय में उल्‍लेखनीय वृद्धि हुई और जीवन स्‍तर में सुधार हुआ।
  • 12 प्रचालनीय क्षेत्रों में किए गए प्रक्षेत्र परीक्षणों / प्रजातीय परीक्षणों के जरिए लगभग 3000 किसान लाभान्वित हुए। धान, ज्‍वार, गेहूं, सब्‍जी, जैसी फसलों पर तकनीकी अंतर्क्षेपणों से किसानों को 20 प्रतिशत अधिक उपज मिली और इससे उनकी सामाजिक आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ। इससे उनमें वैज्ञानिक उत्‍पादन प्रौद्योगिकियों पर विश्‍वास हुआ। किसानों ने पूसा 1121 को सर्वश्रेष्ठ धान प्रजाति का दर्जा दिया। गेहूं की प्रजातियाँ एच.डी. 2687 से 58 क्विं./है., एच.डी. 2733 से 56 क्विं./है. उपज प्राप्त हुई जो स्‍थानीय प्रजातियों की तुलना में 24 प्रतिशत अधिक रही।
  • धान-गेहूं फसल प्रणाली में मूंग की प्रजाति पूसा विशाल को शामिल कर इसका सघनीकरण किया गया। इसके लिए धान की प्रजातियों को विभिन्न संयोजनों में आजमाया गया, जिनमें धान (सुगंध 4) – गेहूं (डब्‍ल्‍यू.एच. 711) – मूंग (पूसा विशाल) ने स्‍थानीय फसल चक्र धान (पी.बी.1) – गेहूं की तुलना में 45% अधिक लाभ दिया। धान - गेहूं फसल प्रणाली में सब्‍जी फसल के रूप में मटर; और रबी मौसम में दलहनी फसल में चने को लेकर किए गए विविधीकरण की वजह से किसानों को 74 प्रतिशत अधिक लाभ मिला।
  • उन्‍नत प्रक्षेत्र उपकरण जैसे व्‍हील हैंड हो, उन्नत हँसिया और खुरपा कम हँसिया के उपयोग से खेतिहर महिलाओं की दक्षता में 2-3 गुनी वृद्धि हुई और 1250 रू / हैक्‍टर आर्थिक लाभ भी प्राप्त हुआ।
  • सरसों की फसल में एक्‍वा हल के जरिए ओरोबंकी खरपतवार के प्रबंधन का प्रदर्शन किया गया। इसके लिए बुआई पूर्व सिंचाई दिए बिना इस यंत्र के जरिए सरसों की बुआई की गई, जिसके परिणामस्‍वरूप खरपतवार के प्रकोप में 32-68 प्रतिशत की कमी आई और उपज में 25 प्रतिशत बढ़ोत्तरी हुई।
  • पिछली खरीफ फसल में ग्‍वार, प्‍याज और तिल की फसल लेने पर भी सरसों में ओरोबंकी के प्रकोप में 7-10 प्रतिशत की कमी आती है। चने की फसल में एकीकृत फसल प्रबंधन अपनाया गया। इसके लिए पुष्‍पन के समय पर प्रति एकड़ 2-3 फेरोमोन ट्रैप लगाए गए। जब प्रतिदिन फेरोमोन टैप में 15-20 वयस्‍क कीट मिलने लगे, तो न्‍यूक्लियर पॉली हेड्रोसिस विषाण (एन.पी.वी.) का छिड़काव किया गया, चने की फसल में पीड़क प्रबंधन के लिए इस विधि को प्रभावी पाया गया और इससे चने की उपज में 40 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
  • राजस्‍थान के चुरू और झुनझुनू जिलों, उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले और दिल्‍ली के गांवों में किसानों को समूह-क्रिया वाले तरीकों को अपनाने के लिए प्रेरित किया गया। यहाँ आठ सहकारी समितियों और तीन किसान क्‍लबों के निर्माण को बढ़ावा दिया गया, जिनमें से प्रत्‍येक में किसान सदस्‍यों की संख्‍या 40 से 80 थी।
  • जल संसाधन मंत्रालय की एक परियोजना में बुलंदशहर, (उ.प्र.) के चार गांवों, झज्‍जर (हरियाणा) के दो गांवों और चुरू और झुनझुनू (राजस्‍थान) के चार गांवों में संचालित किया गया था।
  • जल संरक्षण प्रौद्योगिकियों, यथा दक्षतापूर्ण सिंचाई के लिए लेज़र समतलीकरण (3 है.), धान सघनीकरण प्रणाली (9 है.), उन्नत मृदा स्‍वास्‍थ्‍य के लिए बायोगैस स्‍लरी का उपयोग (8 है.) आदि के प्रदर्शनों ने प्रति इकाई भूमि और प्रति इकाई जल पर टिकाऊ आधार पर उच्च फसल उत्‍पादकता प्रदान की। 
  • गेहूँ (2004-05), धान (मई 2005) और कपास (जून 2005) पर आयोजित की जाने वाली पाठशालाओं ने किसानों में प्रौद्योगिकीय सूचनाओं के जनसामान्‍य के स्‍तर पर त्‍वरित हस्‍तांतरण में उल्‍लेखनीय भूमिकाएँ निभाईं।
  • धान की नई प्रजाति पी. 1509, 15-20 दिन पहले परिवक्‍वता वाली पाई गई। इसमें बकानी के प्रकोप की कोई घटना नहीं दिखाई दी। इसकी उपज में पी. 1121 की तुलना में बढ़त नहीं मिल पाई, जबकि बदरपुर सैद में बढ़त पाई गई। इस प्रजाति के बारे में पूर्ण निष्‍कर्ष पाने के लिए किसानों के खेतों पर और अधिक जाँच करना आवश्‍यक है।
  • धान की प्रजाति पूसा 1401 ने उल्‍लेखनीय उपज प्रदर्शित की और यह बकानी से ग्रस्‍त नहीं होती है। तथापि, पी. 1121 के विपरीत इसका भाव अभी तक निर्धारित नहीं हो सका अत: इसका दाम कम मिला।
  • पूर्वी क्षेत्रों में उच्‍च उपज, अल्‍पावधि और खुशबू के कारण पी.आर.एच.10 एक सर्वश्रेष्ठ गुणवत्ता वाली धान प्रजाति के रूप में उभरी है।
  • गैर-बासमती धान प्रजाति पी. 2511 ने उपज और अल्‍पावधि के गुणों में उत्‍कृष्टता प्रदर्शित की।
  • जिन क्षेत्रों में पानी की समस्‍या नहीं है, वहाँ धान की पी-44 प्रजाति ने सभी स्‍थानीय प्रजातियों (औसत उपज 5.6 टन/है.) को पछाड़ दिया है।
  • समय पर बुआई की दशा में गेहूँ की प्रजाति एच.डी. 2733 और धान-गेहूँ फसल चक्र में एच.डी. 2985 ने सभी स्‍थानों पर बेहतर प्रदर्शन दिया।
  • चने की प्रजाति बी.जी.डी.-72 ने उच्‍च उपज दिया परंतु उसे कम दाम मिला क्‍योंकि इसके दानों का रंग और आकृति को पसंद नहीं किया गया।
  • भरतपुर में मसूर एल.-4076 को के-75 की तुलना में अधिक बाजार भाव मिला क्‍योंकि इसके दाने का आकार और स्‍वाद बेहतर था, इसने 7 प्रतिशत अधिक उपज दी।
  • पूसा नवीन – लौकी का एक विशिष्ट बाज़ार उन जगहों में है जहाँ छोटे आकार के फल पसंद किए जाते हैं, जैसे दिल्‍ली।
  • इन्‍हीं बाज़ारों की पसंद के कारण यह अन्‍य प्रजातियों, जैसे पूसा संतुष्टि की तुलना में अधिक लाभ देती है।
  • सरसों की प्रजाति पूसा बोल्‍ड अभी भी उत्तम उपज देती है। यह उपज सरसों की प्रजाति पूसा विजय से समकक्ष और कहीं-कहीं अधिक भी होती है।
  • गाजर प्रजाति पूसा रुधिरा अपने गहरे लाल रंग, अधिक मिठास और बेहतर बाजार भाव के कारण राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में स्थित किसानों के लिए लाभदायक पाई गई और किसानों ने इससे 2.23 लाख रू. प्रति हैक्‍टर तक शुद्ध लाभ कमाया है।
  • खरबूजे की प्रजाति पूसा मधुरस अपने आकार, आकृति और स्‍वाद के कारण बाजार में पसंद की जाती है, अत: यह लाभदायक पाई गई है। इससे किसानों को केवल 3 माह में 1.85 लाख रू. प्रति हैक्‍टर तक शुद्ध लाभ मिला है। 
  • धान की लघु अवधि प्रजाति पी.बी. 1509 (5.2 टन/है. तक) ने पी.बी. 1121 (4.2 टन/है.) की तुलना में अधिक उपज प्रदान की और इसमें बकानी रोग की कोई घटना रिपोर्ट नहीं की गई।