डॉ. के. वि. प्रभु, संयुक्त निदेशक (अनुसंधान), भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान का जन्म 20 मई 1958 को कर्नाटक के हुबली शहर में हुआ। डॉ. प्रभु ने बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय, वाराणसी से वर्ष 1979 में, अपनी स्नातक डिग्री (बीएस.सी कृषि) और वर्ष 1982 में एम.एससी. (आनुवंशिकी और पादप प्रजनन) की डिग्री प्राप्त की। उन्होंने भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली से वर्ष 1986 में आनुवंशिकी में पीएच.डी. की। डॉ. प्रभु को पीएच.डी. के दौरान किए गए उत्कृष्ट अनुसंधान कार्य के लिए वर्ष 1987 में प्रतिष्ठित जवाहर लाल नेहरु पुरस्कार प्रदान किया गया।


उन्होंने भा.कृ.अ.प. में अक्तूबर 1986 से वैज्ञानिक (पादप प्रजनन) के रूप में अपना व्यावसायिक कैरियर प्रारंभ किया और उनकी नियुक्ति भा.कृ.अ.सं. के क्षेत्रीय केन्द्र, टूटीकंडी (शिमला) में हुई जहां उन्होंने गेहूं और जौ की रतुआ प्रतिरोधिता की आनुवंशिकी और रतुआ प्रतिरोधी किस्मों के प्रजनन पर कार्य किया। उन्होंने गेहूं आनुवंशिकी और ब्रैसिका प्रजनन पर अपने कार्य को निरन्तर आगे बढ़ाने के लिए वर्ष 1982 में नई दिल्ली के मुख्यालय में कार्यभार ग्रहण किया। वर्ष 1998 में उनकी दिलचस्पी बासमती चावल के प्रजनन में विकसित हुई और उन्होंने चयन करने में धान समूह को सहायता प्रदान की। वर्ष 1997 के दौरान उन्हें एफ.ए.ओ. अध्येतावृत्ति लेने के लिए कनाडा में प्रतिनियुक्त किया गया जिससे कि वे भारत के लिए नियंत्रित पर्यावरण अनुसंधान सुविधा को विकसित करने में सहायता प्रदान कर सके। भारत में वापिस आने के बाद, फरवरी 1998 में उन्हें संस्थान की राष्ट्रीय फाइट्रोटोन सुविधा में प्रबंधक जीव विज्ञान की अतिरिक्त जिम्मेदारी दी गई जहां उन्होंने अन्तरराष्ट्रीय मानकों को ध्यान में रखते हुए देशभर के विभिन्न वैज्ञानिकों द्वारा आयोजित किए जाने वाले परीक्षणों का प्रबंधन किया। जनवरी 2003 में, डॉ. प्रभु को राष्ट्रीय फाइटोट्रोन सुविधा की पूरी जिम्मेदारी प्रदान की गई। डॉ. प्रभु की प्रारंभ से ही इस सुविधा को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका रही है और आज तक वे देश की इस अनोखी और आदर्श प्रणाली का नेतृत्व कर रहे हैं जहां जैव प्रौद्योगिकी और आण्विक जीवविज्ञान अनुसंधान से संबंधित 900 से भी अधिक परियोजनाओं को वर्ष 1998 से बिना किसी बाधा के 24 ग् 7 आधार पर सेवाएं प्रदान की जा रही हैं। डॉ. प्रभु ने 26 अक्तूबर 2013 को संयुक्त निदेशक (अनुसंधान), भा.कृ.अ.सं., नई दिल्ली का पदभार ग्रहण करने से पहले 11 जुलाई 2006 से 4 नवम्बर 2013 तक आनुवंशिकी संभाग, भा.कृ.अ.सं. के संभागाध्यक्ष के रूप में कार्य किया।


डॉ. प्रभु ने भारत में बासमती चावल को पुनः परिभाषित करने के मुद्दे पर बहुत अधिक कार्य किया है जिससे कि बासमती चावल की उच्च उपजशील किस्मों का विकास संभव हो सका और भारत के किसान मूल्य संवर्धित बासमती चावल की किस्मों के साथ अन्तरराष्ट्रीय बाजार में प्रभावकारी ढंग से प्रतिस्पर्धा का सामना कर सकें। डॉ. प्रभु ने इस मुद्दे पर लगभग तीन वर्षों तक भारत सरकार के विभिन्न विभागों और मंत्रालयों से निरन्तर विचार-विमर्श करते हुए तब तक कार्य किया जब तक कि वर्ष 2007 में उसे मौजूदा रूप में संशोधित नहीं किया गया। वे गेहूं, ज्वार, ब्रैसिका और धान के फसल सुधार कार्यक्रम से नजदीकी से जुड़े रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप उनका 23 किस्मों के विकास में सक्रिय योगदान रहा है जिसमें से 4 धान की (पूसा बासमती 6, पूसा बासमती 1121, पूसा बासमती 1509 और पूसा 6), 7 भारतीय सरसों की (पूसा मस्टर्ड 21, पूसा मस्टर्ड 24, पूसा मस्टर्ड 25, पूसा मस्टर्ड 26, पूसा मस्टर्ड 28, पूसा मस्टर्ड 29 और पूसा मस्टर्ड 30), गेहूं की 8 (एचएस 240, एचएस 207, एचएस 277, एचएस 295, एचएस 365, एचएस 342 या मानसरोवर, एचडी 3043, एचडी 3059, एचडी 3086 और एचडी 3090), ज्वार की 2 (बीएचएस 169, बीएचएस 252) किस्में थीं। डॉ. प्रभु 1990 के प्रारंभ में सरसों और गेहूं के पादप प्रजनन में परिशुद्धता लाने के लिए पादप जैव प्रौद्योगिकी को पादप प्रजनन में समेकित करने वाले भारत के प्रथम टीम लीडरों में से एक थे। समन्वयक या अन्वेषक के रूप में डॉ. के.वि. प्रभु के नेतृत्व में, एक दर्जन से भी अधिक राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय परियोजनाएं चलाई गईं जिससे हमें न केवल गेहूं, सरसों और धान में सफलताएं प्राप्त हुईं बल्कि देश में पादप प्रजनकों की एक टीम विकसित की जा सकी जिसके कि अधिकांश लीडर अपने-अपने क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं। इन परियोजनाओं के माध्यम से तैयार की गई सूचना का प्रयोग अब इन फसलों के फसल सुधार कार्यक्रमों में पूरे विश्वभर में किया जा रहा है।


अपने व्यावसायिक कैरियर के दौरान डॉ. प्रभु को जवाहर लाल नेहरु अवार्ड, भा.कृ.अ.प. मान्यता अवार्ड 2008, फेलो राष्ट्रीय कृषि विज्ञान अकादमी, इंडियन साइंस कांग्रेस एसोसिएशन का प्लेटिनम जुबली अवार्ड, बी.पी. पाल अवार्ड, वी.एस. माथुर मेमोरियल अवार्ड, बॉरलॉग अवार्ड 2012, रफी अहमद किदवई अवार्ड 2012 आदि जैसे अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार प्रदान किए गए। अपनी अनुसंधान विशेषज्ञता के कारण डॉ. प्रभु ने संघ राष्ट्र के एफएओ जैसे संगठनों और 15 देशों से भी अधिक के संस्थानों में विभिन्न कार्यों को करने के लिए भारत का प्रतिनिधित्व किया है। इनमें अफ्रीका के चार देश भी शामिल हैं जहां वे गरीब किसानों के लाभ के लिए फसल सुधार अनुसंधान के लिए कार्य कर रहे हैं।

 

डॉ. प्रभु ने 4 एम.एससी. और 17 पीएच.डी. के छात्रों को गाइड किया है और वर्तमान में उनके मार्गदर्शन में 4 छात्र अपना पीएच.डी. अनुसंधान कार्य कर रहे हैं। उनके आनुवंशिकी और पादप प्रजनन के मानक जर्नलों में 91 अनुसंधान पेपर प्रकाशित हो चुके हैं।

 

MkW- ds-fo- izHkq

डॉ. के. वि. प्रभु
संयुक्त निदेशक (अनुसंधान)

ई-मेल jd_research[at]iari[dot]res[dot]in
शिक्षा स्नातक (बीएससी कृषि वर्ष 1979 में एमएससी (आनुवंशिकी और पादप प्रजनन वर्ष 1982 में बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय (बीएचयू वाराणसी से वर्ष 1986 में भाकृअसं नई दिल्ली से आनुवंशिकी में पीएचडी
पुरस्कार
  1. जवाहर लाल नेहरू पुरस्कार 1987
  2. भा.कृ.अ.प. मान्यता पुरस्कार 2009
  3. फेलो, राष्ट्रीय कृषि विज्ञान अकादमी
  4. इंडियन साइंस कांग्रेस एसोसिएशन का प्लेटिनम जुबली पुरस्कार
  5. बी.पी.पाल अवार्ड
  6. वी. एस. मेमोरियल अवार्ड
  7. बॉरलॉग अवार्ड 2012
  8. रफ़ी अहमद किदवई अवार्ड 2012
विशेषज्ञता गेहूं, ब्रैसिका और धान प्रजनन