जल प्रौद्योगिकी केन्‍द्र में जल संसाधनों के क्षेत्र में विभिन्‍न प्रौद्योगिकियां विकसित की गई हैं :

  • होलम्‍बीकलागांव, राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्‍ली में नलकूप कमान क्षेत्र का विकास। किसानों के सहयोग से किसानों के खेतों में पूर्व निर्मित सिंचाई नालियां स्‍थापित की गईं।
  • दिल्‍ली संघ राज्‍य का भूजल गुणवत्‍ता मानचित्र तैयार किया गया है ताकि किसान व नियोजक उसका उपयोग कर सकें। दिल्‍ली प्रशासन इस रिपोर्ट का उपयोग गाइड के रूप में कर रहा है। इसे 1998 में अद्यतन किया गया है।
  • दिल्‍ली के आलीपुर ब्‍लॉक के चुने हुए गांवों को बड़े पैमाने पर मृदा लवणता संबंधी समस्‍या का परीक्षण करके सलाह दी गई।
  • कृषि विज्ञान केन्‍द्र के फार्म, शिकोहपुर गांव (हरियाणा) तथा कटराईं (हिमाचल प्रदेश) स्थित संस्‍थान के अनुसंधान फार्म का नियोजन और विकास किया गया।
  • सिंचाई कमान क्षेत्रों में जल संतुलन के महत्‍व का प्रदर्शन व प्रलेखन किया गया।
  • सिंचित क्षेत्रों में जल निकासी डिजाइन के लिए जल निकासी व मानदण्‍ड तैयार किये गए।
  • परत बिछाने की विभिन्‍न सामग्रियों के आर्थिक मूल्‍यांकन के साथ-साथ पानी की नालियों में परत बिछाने से इन प्रौद्योगिकियों को सिंचाई की योजनाओं में विभिन्‍न राज्‍य सरकार की एजेन्सियों को अपनाने में सहायता मिली है।
  • दिल्‍ली संग्रहालय के चांदपुर गांव में सीमांत किसानों के लवणता से प्रभावित खेतों में उचित सतही जल निकासी प्रणालियां डिजाइन करके स्‍थापित की गईं।
  • बिहार में सोन कमान क्षेत्रों, उत्‍तर प्रदेश में शारदा सहायक नहर कमान क्षेत्र तथा राजस्‍थान में नहर कमान क्षेत्र में परतदार जल नाली प्रणाली (पूर्व निर्मित परतदार ब्‍लॉकों का उपयोग करके) विकसित की गईं।
  • पलाडूगु मुख्‍य वितरण प्रणाली, नागार्जुन-सागर परियोजना (आन्‍ध्र प्रदेश) के कमान क्षेत्र में तर्क संगत जल वितरण प्रणाली डिजाइन करके अपनाई गई। यह योजना सीएडीए प्राधिकारियों द्वारा 200 से भी अधिक वितरण प्रणालियों में अपनाई गई।
  • बेकार पड़े नलकूपों के सर्वेक्षण के लिए एक त्रि-आयामी बोरहोल, कैमरा प्रणाली का उपयोग किया गया। इन कुओं के सूख जाने के कारणों का पता लगाने के पश्‍चात् पंजाब, हरियाणा, उत्‍तर प्रदेश, गुजरात और आन्‍ध्र प्रदेश में उपचारात्‍मक उपाय अपनाने के लिए सुझाव दिये गए।
  • पिंडारी माइनर वितरण प्रणाली, मथुरा, उत्‍तर प्रदेश में किसाना के खेतों में खेत-जल संतुलन पर आधारित सिंचाई अनुसूची विकसित की गई जिससे गेहूं की फसल में 2-3 सिंचाइयों की बचत करने में सहायता मिली।
  • केन्‍द्रीय सिंचाई एवं विद्युत शक्ति मंडल द्वारा 'इरीगेशन शेड्यूलिंग अंडर लिमिटेड वाटर अवेलेबिलिटी' शीर्षक का एक मैनुअल प्रकाशित किया गया है तथा इसे सभी सिंचाई परियोजना प्राधिकारियों के बीच बांटा गया है।
  • अलीपुर गांव (दिल्‍ली), इन्‍दौर (मध्‍य प्रदेश) और शिकोहपुर गांव (हरियाणा राज्‍य) के किसानों के समक्ष शुष्‍क खेती की स्थिति के अन्‍तर्गत रबी फसलों की जलीय-बुवाई की तकनीक प्रदर्शन किया गया तथा इसे दूरदर्शन द्वारा भी प्रसारित किया गया है।
  • तनावमापी की डिजाइन तैयार करने, उसे सुगठित करके तैयार करने की प्रौद्योगिकी विकसित की गई तथा यह प्रौद्योगिकी कुछ कृषि विश्‍वविद्यालयों व अन्‍य संगठनों को हस्‍तांतरित की गई।
  • अनेक फार्म सिंचाई वितरण एवं मापन संरचनाओं का विकास किया गया व उनकी डिजाइनें तैयार की गईं। इन्‍हें अनेक राज्‍य सरकार की एजेन्सियों द्वारा अपनाया जा रहा है।
  • इस केन्‍द्र के तकनीकी मार्गदर्शन में जल संग्रहण पर एक फिल्‍म तैयार की गई जिसे इसकी 'शैक्षणिक तथा तकनीकी' विषय-वस्‍तु के लिए चेकोस्‍लोवाकिया में आयोजित अन्‍तरराष्‍ट्रीय कृषि-फिल्‍म समारोह में प्रथम पुरस्‍कार प्राप्‍त हुआ।
  • चाय के बागानों में फील्‍ड आधारित अनुसंधान से सिंचाई तथा चाय की फसल की उपयुक्‍तम बढ़वार के लिए उचित जड़ क्षेत्र नमी अंश की पहचान में सहायता मिली है। विभिन्‍न नमी क्षेत्रों में प्रभावी जड़ गहराई तथा सिंचाई संबंधी आवश्‍यकताओं की पहचान की गई।
  • चाय बागानों के जल निकासी से प्रभावित क्षेत्रों में विभिन्‍न प्रकार की जल निकासी एवं नियं‍त्रण संरचनाएं डिजाइन की गईं व उनका सफलतापूर्वक प्रदर्शन किया गया। अन्‍तरिक्ष अनुप्रयोग केन्‍द्र, अहमदाबाद के सहयोग से जल की कमी वाली व सामान्‍य फसलों के सुदूर संवेदी संकेत विकसित किये गए। इन अध्‍ययनों में पहचानी गई रेडियो तरंगों का उपयोग आईआरएस-1 रेडियोमीटर में किया जाएगा।