मूल तथा कार्यनीतिपरक अनुसंधान

  • उन्‍नत कृषि कार्यों को अपनाने में आने वाली बाधाओं तथा अनुकूलन की सीमा का अध्‍ययन
  • सूचना तथा प्रौद्योगिकियों के प्रसार की विस्‍तार विधियों तथा प्रभावी संचार कार्यनीतियों का सृजन
  • प्रशिक्षण कार्यनीतियां तैयार करने के लिए किसानों और प्रसार कार्मिकों की प्रशिक्षण संबंधी आवश्‍यकताओं का मूल्‍यांकन
  • कृषि विकास संगठनों का संगठनात्‍मक ढांचा, उनकी क्रियाविधियों व कार्यप्रणाली पर अनुसंधान अध्‍ययन
  • प्रसार एवं अनुसंधान प्रबंध की प्रभावशीलता बढ़ाने पर अध्‍ययन
  • विकास कार्यक्रमों का प्रभाव
  • किसानों के उद्यमशीलता संबंधी व्‍यवहार का अध्‍ययन
  • फार्म सूचना के प्रचार-प्रसार और अनुकूलन की प्रौद्योगिकी तथा संचार की संपूर्ण प्रक्रिया को समझना
  • अधिगम (लर्निंग), किसानों के व्‍यवहार, प्रवृत्तियों और प्रेरणा से संबंधित मूल अध्‍ययन
  • अनुसंधान की सीमा के विभिन्‍न पैमाने तथा उनकी माप
  • कृषि प्रौद्योगिकी को अपनाने से संबंधित घटकों एवं बाधाओं की पहचान
  • प्रशिक्षण विधियों तथा प्रशिक्षण कार्यनीतियों की पहचान
  • कार्य अनुसंधान पर आधारित नई प्रसार कार्यनीतियों का विकास
  • प्रसार प्रबंध में आने वाली बाधाओं की पहचान तथा प्रसार प्रबंध को सुधारने के तरीके और उपाय
  • भारत में पहली बार प्रसार एवं विकास प्रबंधकों से संबंधित विभिन्‍न क्षेत्रों में उनकी प्रबंधात्‍मक कुशलताओं में सुधार के लिए चौदह प्रशिक्षण मॉड्यूल विकसित किए गए हैं।
  • ग्रामीण उद्यमशीलता विकास पर प्रशिक्षण मॉड्यूल
  • प्रसार प्रबंध से संबंधित पचास मामले विकसित किये गए हैं जो प्रसार में प्रशिक्षण तथा शिक्षण की दृष्टि से अत्‍यंत उपयोगी हैं।
  • गांवों में 'ग्रामीण सामाजिक केन्‍द्र' के माध्‍यम से ग्रामीण गरीबी व बेरोजगार को दूर करने के लिए एक मॉडल का सफल विकास एवं उसका कार्यान्‍वयन
  • सात फसलों नामत: धान, सरसों, आम, खुम्‍भी, टमाटर, मटर और ग्‍लेडियोलस के लिए प्रसार की विशेषज्ञ प्रणाली का विकास
  • प्रसार व्‍यवसायविदों के लिए अभिमुख निष्‍पादन मूल्‍यांकन प्रणाली का विकास
  • गोबर तथा चूने के उपयोग से चावल में खेरा रोग के प्रबंध के देसी तकनीकी ज्ञान का सत्‍यापन तथा चूने और नमक के द्वारा गन्‍ना की फसल में दीमकों का नियंत्रण और नदी के तट की बालू में नालियां बनाकर ककड़ी वर्गीय सब्‍जी की फसलों की खेती

नीतिगत दिशा निर्देश

  • उन्‍नत कृषि प्रौद्योगिकियों पर राष्‍ट्रीय प्रदर्शन की संकल्‍पना सर्वप्रथम इस संभाग द्वारा विकसित करके कार्यान्वित की गई थी। इस कार्यक्रम को राष्‍ट्रीय प्रदर्शन पर राष्‍ट्रीय स्‍तर के कार्यक्रम में स्‍वीकार किया गया और इसे 1965 में आरंभ किया गया।
  • अपने स्‍थापना काल से ही यह संभाग कृषि विश्‍वविद्यालयों तथा भा.कृ.अ.प. के संस्‍थानों को प्रसार शिक्षा पर शिक्षण, अनुसंधान एवं प्रशिक्षण के क्षेत्रों में नेतृत्‍व प्रदान करता आ रहा है।
  • संभाग ने 2002 के दौरान राष्‍ट्रीय स्‍तर पर कृषि प्रसार में स्‍नातकोत्‍तर पाठ्यक्रमों को संशोधित करने व उसे सुधारने में नेतृत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • कृषि प्रसार में प्रगत अध्‍ययन केन्‍द्र के माध्‍यम से इस संभाग ने प्रसार प्रबंध, उद्यमशीलता विकास, सूचना प्रौद्योगिकियों तथा प्रशिक्षण प्रौद्योगिकियों जैसे उभरते हुए क्षेत्रों में राष्‍ट्रीय स्‍तर के प्रशिक्षण कार्यक्रमों को डिजाइन करने व उन्‍हें संचालित करने में प्रमुख भूमिका अदा की है।     

भावी प्रमुख अनुसंधान

  • भावी कृषि परिदृश्‍य ज्ञान गहन होगा जिसके लिए उत्‍पादकता, टिकाऊपन, लाभदायकता और समानता जैसे मुद्दों पर विशेष ध्‍यान देना होगा ताकि टिकाऊ कृषि विकास हो सके। इसके लिए बेहतर कृषि तथा उन्‍नत आजीविका के लिए विभिन्‍न स्रोतों से ज्ञान एवं सूचना के अनुप्रयोग हेतु कुशल प्रबंधात्‍मक निपुणता की आवश्‍यकता होगी ताकि किसानों, कृषि वैज्ञानिकों, प्रसार विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं के बीच समन्‍वय स्‍थापित किया जा सके।
  • इसके लिए उचित प्रौद्योगिकियों के मूल्‍यांकन व हस्‍तांतरण में सार्वजनिक-निजी संपर्क स्‍थापित करने हेतु उपयुक्‍त क्रियाविधियों को अपनाते हुए भागीदारी की विधियों से फार्मिंग प्रणालियों के दृष्टिकोण पर आधारित प्रसार मॉडलों के विकास की आवश्‍यकता है।
  •  भारत में प्रसार प्रणालियों और ज्ञान के प्रबंध को और सरल बनाने के लिए आधुनिक संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकियों का प्रभावी उपयोग किया जाना है। ग्राम ज्ञान केन्‍द्रों, विभिन्‍न फसलों के लिए विशेषज्ञ प्रणालियों, ई-अधिगम तथा मौसम पर आधारित भविष्‍यवाणी एवं संसाधन डेटा बैंक विकसित करने की आवश्‍यकता है।
  • परिवर्तित हो रहे सामाजिक-आर्थिक परिदृश्‍य में ऐसे सूक्ष्‍म उपयोगों के अनुरूपण तथा उन्‍हें सहायता प्रदान करने की आवश्‍यकता है जिनमें मांग पर आधारित प्रौद्योगिकियों के आधार पर ठोस कृषक-परामर्श सेवाओं से युक्‍त कृषि व्‍यापार प्रसार प्रणाली के माध्‍यम से ग्रामीण उद्यमशीलता के विकास पर अधिक से अधिक ध्‍यान दिया गया हो।
  • पंचायती राज संस्‍थाओं के रूप में स्‍थानीय स्‍वशासन ग्रामीण स्‍तर पर उपयुक्‍त प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देने व उनके हस्‍तांतरण और विभिन्‍न विकास एजेन्सियों के साथ प्रभावी संपर्क स्‍थापित करने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
  • वानिकी, पर्यावरण, सिंचाई, कृषि-उद्योग, स्‍वास्‍थ्‍य और शिक्षा जैसे विभिन्‍न क्षेत्रों को शामिल करते हुए ग्रामीण विकास के लिए अन्‍तर-क्षेत्रीय सूक्ष्‍म स्‍तर का नियोजन आवश्‍यक हो जाएगा ताकि समेकित आउटपुट या निर्गत का सृजन हो सके। क्षमता निर्माण संबंधी कार्यक्रमों के माध्‍यम से महिलाओं के सशक्तिकरण के द्वारा आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित करने में बहुत सहायता मिलेगी।