भा.कृ.अ.सं., क्षेत्रीय स्टेशन, कटराईं (कुल्लू घाटी) हि.प्र.

डॉ. राज कुमार
अध्यक्ष
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परिचय
देश को शीतोष्ण वर्गीय सब्जियों के बीजोत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने का श्रेय भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के क्षेत्रीय स्टेशन कटराईं को जाता है । स्टेशन द्वारा विकसित सब्जी उत्पादन एवं सब्जियों  के बीजोत्पादन तकनीकी के विकास की सफलता को सभी अच्छी तरह से जानते हैं । देश में इसका सबसे अच्छा उदाहरण पहली बार फूलगोभी (स्नोबाल समूह) के बीजोत्पादन में सफलता प्राप्त करना है । इस समय स्टेशन पर 26  सब्जियों की 60 प्रजातियों / संकर  का बीजोत्पादन हो रहा है ।

संक्षिप्त इतिहास
भारत में द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) से पहले शीतोष्ण वर्ग की सब्जियों के बीज विदेशों से आयात किये जाते थे । द्वितीय विश्व युद्ध के समय इन बीजों के आयात करने में कठिनाई होने के कारण भारत की अंग्रेज सरकार ने 1942-43 में इस वर्ग की सब्जियों के बीजों का उत्पादन क्वेटा (बलूचिस्तान) में आरम्भ किया] जो देश का विभाजन होने पर पाकिस्तान में चला गया । विभाजन के पश्चात भारत सरकार के कृषि एवं खाद्य मंत्रालय ने एक विशेषज्ञ समिति के सुझाव पर कुल्लू घाटी में मई 1949 में केन्द्रीय सब्जी प्रजनन स्टेशन की स्थापना की जिसके प्रथम अध्यक्ष श्री डी.एच. वशिष्ठ थे । स्टेशन का सर्वप्रथम कार्यालय रायसन में स्थापित हुआ उसके बाद मई 1954 तक नग्गर में रहा और अंतत: 1955 में इसे भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के अधीन करते हुए भा.कृ.अ.सं. सब्जी अनुसंधान स्टेशन के नाम के साथ कटराईं में स्थानांतरित किया गया । इसका प्रारंभिक मुख्य उद्देश्य शीतोष्ण वर्गीय सब्जियों के उच्च गुणवत्ता वाले बीजों का उत्पादन, किसानों में उनका वितरण,बीजोत्पादन तकनीकों का विकास तथा उन्नत किस्मों का चयन व विकास करना था । अंत में इसका नाम भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान,  क्षेत्रीय स्टेशन, कटराईं (कुल्लू घाटी) हि.प्र. हुआ ।
सन्‍ 1955 में इस स्टेशन को भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के अंतर्गत लाने के बाद डा. हरभजन सिंह जी के नेतृत्व में यहाँ पर शीतोष्ण वर्ग की सब्जियों में सुचारू रूप से सुधार एवं अनुसंधान कार्य शुरू हुआ जिसके परिणाम स्वरूप इन सब्जियों की विशिष्ट गुणों वाली कई श्रेष्ठतम किस्मों का विकास किया गया,  साथ ही उन्होंने इन सब्जियों की बीजोत्पादन प्रौद्योगिकी का मानकीकरण किया । स्वदेशी तकनीकी से शीतोष्ण वर्गीय सब्जियों का बीजोत्पादन, विदेशों से आयातित बीजों एवं हिमाचल प्रदेश के बीज उपादन उद्योगों को जीवित रखने का अनोखा उदाहरण है । डा. हरभजन सिंह जी द्वारा किये गये सब्जियों में सुधार कार्यक्रम के माध्यम से आज भी देश में अनेक विशिष्ट प्रजातियाँ अग्रणी हैं । तब से आज तक यह स्टेशन सब्जियों में सुधार एवं इनके बीजोत्पादन के कार्य में अग्रसर है ।
इस स्टेशन पर 1957-60 तक आवश्यक खाद्य तेल परियोजना पर भी कार्य हुआ था । सन्‍ 1960 में पुष्प विभाग के जुड जाने के पश्चात यहाँ कंद वाले फूलों का एकत्रीकरण एवं उनकी खेती का शुभारम्भ हुआ । इसका मुख्य उद्देश्य फूलों पर अनुसंधान कार्य था, इन फूलों की कुछ अच्छी किस्मों का विकास किया गया जिससे इनकी चाह रखने वालों को अच्छी व स्वस्थ किस्मों का बीज प्राप्त हो सके । सन्‍ 1969-75 तक यहाँ पर सोयाबीन के ऊपर भी कार्य हुआ तथा इसकी ‘ली’ नामक प्रजाति का अनुमोदन किया गया ।
सन्‍ 1970-71 में स्टेशन पर अखिल भारतीय शाकीय समन्वित परियोजना आरम्भ की गयी जिसके अंतर्गत सब्जियों में सुधार के अतिरिक्त पादप रोग विज्ञान व कीट विज्ञान संभागों को भी संगठित किया गया ताकि सब्जियों की बीमारियों व कीडों की रोकथाम के बारे में भी अनुसंधान किया जा सके ।
स्टेशन पर सन्‍ 1972 में अखिल भारतीय पुष्प समन्वित परियोजना के अंतर्गत कंद वाले पुष्पों में सुधार के लिये शोध कार्य आरम्भ किया गया जिनमें मुख्य रूप से नारसीसस, डेफोडिल, ट्यूलिप, आइरिस, ग्लेडिओलस व डहेलिया आदि हैं ।

कटराईं कैसे पहुँचें
कटराईं, चण्डीगढ से 296 कि.मी. दूर अम्बाला-मनाली राष्ट्रीय राज मार्ग संख्या 21 पर कुल्लू व मनाली के मध्य (दोनों ओर से 20 कि.मी.) स्थित है । सडक माध्यम द्वारा दिल्ली से 562 कि.मी., पठानकोट से 340 कि.मी. एवं शिमला से 257 कि.मी. व अन्य कई जगहों से मनाली के लिए सीधा रास्ता है जो आगे रोहतांग पास होता हुआ लाहुल व स्पीति घाटी को जाता है । हवाई यात्रा के लिए दिल्ली-कुल्लू मार्ग पर भुंतर विमानपत्तन से कटराईं स्टेशन मात्र 29 कि.मी. की दूरी पर स्थित है ।

प्रायोगिक प्रक्षेत्र
इस समय यहाँ पर मुख्य कार्यालय के अलावा तीन अन्य अनुसंधान फार्म नग्गर, सरसेई व बडाग्रां में हैं जो आपस में 5 से 8  कि.मी. की दूरी पर स्थित हैं ।

कार्यालय एवं अनुसंधान प्रयोगशालाएं: मुख्य कार्यालय, जिसका कुल क्षेत्रफल 1.47 हेक्टर है, कुल्लू – मनाली राष्ट्रीय राजमार्ग-21  पर कटराईं गाँव से आधा कि.मी. पहले स्थित है । यहाँ पर अनुसंधान प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, कार्यालय तथा 25 विभिन्न श्रेणियों के आवास हैं । इस स्टेशन पर दो ग्लास हाउस, एक ट्रांसजेनिक पोली हाउस, समस्त सामग्री से परिपूर्ण प्रयोगशालाएं, बीज संसाधनशाला, नवीनतम साधनों से सुसज्जित संगोष्ठी कक्ष एवं इंटरनेट सुविधा उपलब्ध है । यहाँ के पुस्तकालय में विद्योपार्जन व व्यावहारिक उपयोगी पुस्तकें, विभिन्न प्रकार के जर्नल उपलब्ध हैं । स्टेशन के विभिन्न तीनों फार्मों पर भी एक-एक पोली हाउस व कार्यालय / प्रक्षेत्रीय प्रयोगशालाएं उपलब्ध हैं ।


नग्गर फार्म: यह फार्म समुद्र तल से 1688 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है जिसका कुल क्षेत्रफल 3.8 हेक्टर है । यहाँ पर मुख्य रूप से मूली, शलजम, चुकंदर, बंदगोभी, मटर, सलाद, टमाटर, शिमला मिर्च, बैंगन, फ्रासबीन, शीतोष्ण गाजर, विलायती पालक व खीरा के बीज उत्पादन हेतु खेती होती है । इस फार्म पर उपर्युक्त सभी फसलों में सुधार के लिए भी अनुसंधान कार्य होता है । यहाँ पर वार्षिक बर्षा लगभग 1000 से 1100 मि.मी. एवं 1100 से 1300 मि.मी. तक हिमपात होता है ।


बडाग्रां फार्म: यह फार्म समुद्र तल से 1560 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है जिसका कुल  क्षेत्रफल 2.6. हेक्टर है । यहाँ पर मुख्य रूप से स्नोबाल फूलगोभी, गाँठगोभी, पालक, गाजर, ब्रसल्स स्प्राउटस, मूली, शलजम, चुकंदर, सलाद, टमाटर, बैंगन व शिमला मिर्च की खेती होती है । इस फार्म पर उपर्युक्त सभी फसलों में सुधार के लिए अनुसंधान कार्यभी होता है । यहाँ पर वार्षिक बर्षा लगभग 950 से 1000 मि.मी. एवं 1000 से 1100 मि.मी. तक हिमपात होता है ।

सरसेई फार्म: यह फार्म समुद्र तल से 1650 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है जिसका कुल क्षेत्रफल 2.08 हेक्टर है । यहाँ पर मुख्य रूप से मूली, शलजम, चुकंदर, बंदगोभी, मटर, सलाद, टमाटर, शिमला मिर्च, बैंगन, खीरा, चप्पन कद्दू व एस्पैरागस की खेती होती है । इस फार्म पर उपर्युक्त सभी फसलों में सुधार के लिए अनुसंधान कार्य भी होता है । यहाँ पर वार्षिक बर्षा लगभग 1100 से 1200 मि.मी. एवं 1200 से 1500 मि.मी. तक हिमपात होता है ।