डॉ. के. अन्नपूर्णा
सूक्ष्मजीवविज्ञान विभाग अध्यक्ष

फोन : 011-25847649
फैक्स : 011-25847643, 25846420
ई-मेल : head_micro[at]iari[dot]res[dot]in

 

सूक्ष्मजीवविज्ञान संभाग की स्थापना 1961 में मृदा विज्ञान एवं कृषि रसायनविज्ञान संभाग से मृदा सूक्ष्मजीवविज्ञान इकाई तथा वनस्पति संभाग से शैवालविज्ञान को अलग करके इस संभाग के रूप में की गई थी। इस संभाग के मुख्य अधिदेश हैं : कृषि की दृष्टि से महत्वपूर्ण सूक्ष्मजीवों के क्षेत्र में अनुसंधान, शिक्षण और प्रसार का कार्य सम्पन्न करना, देश के एक अग्रणी केन्द्र के रूप में कार्य करना, और कृषि सूक्ष्मजीवविज्ञान के लिए राष्ट्रीय स्तर की प्राथमिकताएं निर्धारित करना। संभाग में अनुसंधान कार्य के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं : मृदा सूक्ष्मजीवविज्ञान, व्यावहारिक सूक्ष्मजीवविज्ञान और शैवाल विज्ञान। पिछले चार दशकों के दौरान इस संभाग ने अनाजों, मोटे अनाजों, फलीदार फसलों एवं तिलहनी फसलों (मूंगफली और सोयाबीन) के लिए नाइट्रोजन स्थिर करने वाले सूक्ष्मजीवों के विलगन और चयन, जीवाणुओं (राइजोबियम, एज़ोटोबैक्टर, एज़ोस्पि‍रिलम, फास्फेट घुलनशील जीवाणुओं) एवं चावल के लिए साइनोबैक्टीरियाई जैव-उर्वरकों (नील हरित शैवाल) के वृहत उत्पादन हेतु उत्पादन प्रोटोकालों का विकास किया है। इसके अतिरिक्त यहां गुणवत्ता नियंत्रण प्राचलों, फास्फेट विलेयीकरण, कार्बनिक पदार्थों के पुनरोपयोग एवं मानव संसाधन विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए गए हैं। इस संभाग में राइज़ोबियम, साइनोबैक्टीरिया एवं कृषि की दृष्टि से महत्वपूर्ण कुछ अन्य जीवाणुओं एवं कवकों का जननद्रव्य संकलन भी उपलब्ध है। इस संभाग में स्नातकोत्तर उपाधि के लिए प्रति वर्ष औसतन 10 छात्रों को प्रवेश दिया जाता है जो एम.एससी. व पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त करने के लिए न केवल भारत से बल्कि विदेश से भी आते हैं। इस संभाग का ही एक अंग नील हरित शैवाल उपयोग केन्द्र है जिसके लिए स्नातकोत्तर शिक्षा सहित क्रियाकलाप सूक्ष्मविज्ञान संभाग से ही संचालित किए जाते हैं। संभाग के अधिदेश हैं :

  • लाभदायक सूक्ष्मजीवों के क्षेत्र में अनुसंधान शिक्षा एवं प्रसार संबंधी कार्य सम्पन्न करना।
  • देश के एक अग्रणी केन्द्र के रूप में सेवा करना
  • कृषि सूक्ष्मजीवविज्ञान के लिए राष्ट्रीय प्राथमिकताएं तय करना